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मेरे यार

अब्र से कब्र तक रास्ता रखते है।
कुछ लोग इस क़द्र वास्ता रखते है ।।

ख़ुद रोते नहीं।
हम रो दे, तो हौंसला तैयार रखते है ।।

खड़े रहते है साथ, हाथों में हाथ ।
ऐसे गीले जज़्बात रखते है ।।

पुरज़ोर कोशिशें रहीं बिखेरने की हमें।
वो हर वार नाक़ाम करने का हथियार रखते है ।।

ना डिगे थे, ना डिगेंगे तुमसे।
के हम ऐसे यार रखते है ।।






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हुनर

वह नगीनों की घिसाई का काम करता था। उसकी पारखी आँखें कम रोशनी में भी खोट पहचान लेती थी और उसी परख की बदौलत घर का चूल्हा रंग बदलता था। चुनिंदा रंग देखे थे उन आँखों ने पर नीलम का मोरिया रंग उसे बहुत भाता था। जिस दिन मालिक उसे नीलम पकड़ा देता, मानो उसे खुद की सुध-बुध न रहती। उसकी हालत दारु के ठेके के बाहर बैठे दारुड़ियों सी हो जाती। वह उसे उठा-उठा के देखता, अपनी आँखों के सामंने नचाता, उसे काटते हुए उसका कलेजा रह-रह कर मुँह को आता। बालों में सफेदी आयी और आँखों में धुंधलापन। अब सिवाय डबडबायें रंगों के और कुछ न दिखता। बैठक अब किसी सेठ की गद्दी पर न होकर घर के बाहर के नीम के नीचे पड़ी खाट पर होती। गली के बच्चे खेल-खेल में उसे कंचे और पत्थर थमा देते और उसके कानों में कटिंग मशीन की गरारियों का शोर गूँज उठता और हाथ ख़ुद ब ख़ुद पत्थर को आँखों के सामने हिलाने-ढुलाने लगते। पत्थरों का क्या है...किसी भी रंग के सही। 

अब तलक वो - ग़ज़ल

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होने नहीं देती

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