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न हो

 नाम लो मेरा यूँ ऊंचाई से आवाज़ हो पर शोर न हो पैर उठे तो फिर पहुंचे कहीं होश हो पर होश न हो ऐसी जवानी किस काम की जिस्म हो पर जोश न हो दुआ-सलाम रखो सबसे ऐसे मीठी हो पर ज़ुबां चोट न हो मत करो पीछा उसका जिसे चाह हो पर मोह न हो
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ruk jao na

रुक जाओ न, मत जाओ न। फिर नहीं आना, तो यूँ सताओ न। कहाँ आते हैं जाने वाले, कहा मान जाओ न। रुक जाओ न, मत जाओ न। धुंधला सा दिखता है मुकद्दर अब तो। बारिश बन कर बरस जाओ न। कैसे मुस्कुराऊँ समझ नहीं आता। मन को मेरे बहलाओ न। मत जाओ न। आते-आते फिसल गया वो लम्हा मेरे हाथ से। कुछ करिश्मा कर ऐ ख़ुदा वो लौट आये न। मत जाओ न, तुम मत जाओ न। रुक जाओ न, मत जाओ न। फिर नहीं आना, तो यूँ सताओ न। कैसे मुस्कुराऊँ समझ नहीं आता। मन को मेरे बहलाओ न। रुक जाओ न, मत जाओ न। मत जाओ न।

निपट जाओ तुम

निपट जाओ तुम, के दुनियां चाहती है तुम्हे भूलना। तुम्हे याद रखना तौहीन है, तुम्हारा हाल ग़मगीन है।। तुम बड़बड़ाते हो, यहाँ-वहाँ बेमतलब मुँह चलाते हो। ज़माना उसी का है, जिसके हाथ में संगीन है।। क्या याद आ गया तुम्हे, जो चौंक कर उठ बैठे तुम। यादों में ही वक़्त गुज़रना है, अब यही तुम्हारी ज़मीन है ।। न देखो हाथ किसी हमसाये का, हमदर्द का बढ़ते हुए । किस-किस से उम्मीद रखोगे, ये लंबी नींद है ।। निपट जाओ तुम, के तुम्हे हाथ लगाने को जी नहीं चाहता है। याद दिलाते हो बचपन जिसे तुम चलाते थे, गिरने पर उठाते थे ।। जो तुमने सौंपा ज़िद्द थी तुम्हारी, पागलपन था या ज़िम्मेवारी। जो तुम्हे मिल रहा है, वो चढ़ती उम्र की खुमारी ।। निपट जाओ तुम, वर्ना निपटा दिए जाओगे। मचल रहे है हाथ अपनों के, सलटा दिए जाओगे ।। निपट जाओ तुम, कि अब देखा नहीं जाता तुम्हारा दर्द और क्रंदन। कर देंगे तुम्हारा वह सब, जिसे कहते है संस्कार, श्राद्ध और तर्पण ।। सिर्फ़ एक बात बताते जाना, इससे पहले कि देर हो जाए। अपने पिता को कहा फेंका था तुमने? क्यों ना तुम्हे भी वही पटका जाए ।।

क्यों नहीं

आजकल वो हमसे उलझते नहीं, सवाल दिल के सुलझते नहीं। माना दुशवारियाँ है राहों में, पर पैर यूँ भी तो पटकते नहीं।। वक़्त है कम और बातें बहुत है, उनके जज़्बात अब भटकते नहीं। तू है अपना और अपना रहेगा, ये एहसास कहीं अटकते नहीं।। गहरा है पानी कुछ और आगे सनम, और क़दम आपके लरज़ते नहीं। हाथ जो हाथ में थाम लेते है, फिर यूँ भी तो पलटते नहीं।। चुन लिया है तुम्हें सबको अनसुना करके, बात-बात पर यूं बहकते नहीं। इश्क़ है ज़हर तो ज़हर ही सही, मान कर दवा गटकते नहीं।।

नहीं

क्या खोज रहा हूं, किसकी प्यास है पता नहीं दरिया, समंदर, किश्ती, किनारा, इनकी मुझे तलाश नहीं। रो दूं, तो आंसू भी ज़मी पी जाए जो न रोऊं, तो ख़ून में आंच नहीं। पत्थर के घर में रहता हूं, शीशा बनकर टूट जाऊं तो किसी का मोहताज नहीं। रात है, बात है, रात की ही बात है सुबह बोल जाऊं तो मुझसा बदज़ात नहीं। क्या देखते हो, क्या देखने आए हो  तुम्हें पसंद आए, ऐसे तो हालात नहीं। रात को इंसा भौंकते हैं, और कुत्ते सोते हैं किसकी सरकार है, के आदमी की कोई औकात नहीं।

हुनर

वह नगीनों की घिसाई का काम करता था। उसकी पारखी आँखें कम रोशनी में भी खोट पहचान लेती थी और उसी परख की बदौलत घर का चूल्हा रंग बदलता था। चुनिंदा रंग देखे थे उन आँखों ने पर नीलम का मोरिया रंग उसे बहुत भाता था। जिस दिन मालिक उसे नीलम पकड़ा देता, मानो उसे खुद की सुध-बुध न रहती। उसकी हालत दारु के ठेके के बाहर बैठे दारुड़ियों सी हो जाती। वह उसे उठा-उठा के देखता, अपनी आँखों के सामंने नचाता, उसे काटते हुए उसका कलेजा रह-रह कर मुँह को आता। बालों में सफेदी आयी और आँखों में धुंधलापन। अब सिवाय डबडबायें रंगों के और कुछ न दिखता। बैठक अब किसी सेठ की गद्दी पर न होकर घर के बाहर के नीम के नीचे पड़ी खाट पर होती। गली के बच्चे खेल-खेल में उसे कंचे और पत्थर थमा देते और उसके कानों में कटिंग मशीन की गरारियों का शोर गूँज उठता और हाथ ख़ुद ब ख़ुद पत्थर को आँखों के सामने हिलाने-ढुलाने लगते। पत्थरों का क्या है...किसी भी रंग के सही। 

अब तलक वो - ग़ज़ल

अब तलक वो हमें याद करते हैं, थोड़ा-थोड़ा बर्बाद करते हैं।। काफ़िला तो गुज़र गया यारों, मुसाफ़िरों को याद करते हैं।। मंज़रे सहरा तब उभर आया, जब वो बारिश की बात करते हैं।। इंसा-इंसा को भी क्या देगा, क्यों हम उनसे फ़रियाद करते हैं।।  ज़िल्लतें जिनकी ख़ातिर पी हमने, वही हमसे किनारा करते हैं।। थका-हारा दिल आख़िर टूट गया, क्यों अब उससे कोई आस रखते हैं।।