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निपट जाओ तुम

निपट जाओ तुम, के दुनियां चाहती है तुम्हे भूलना।
तुम्हे याद रखना तौहीन है, तुम्हारा हाल ग़मगीन है।।

तुम बड़बड़ाते हो, यहाँ-वहाँ बेमतलब मुँह चलाते हो।
ज़माना उसी का है, जिसके हाथ में संगीन है।।

क्या याद आ गया तुम्हे, जो चौंक कर उठ बैठे तुम।
यादों में ही वक़्त गुज़रना है, अब यही तुम्हारी ज़मीन है ।।

न देखो हाथ किसी हमसाये का, हमदर्द का बढ़ते हुए ।
किस-किस से उम्मीद रखोगे, ये लंबी नींद है ।।

निपट जाओ तुम, के तुम्हे हाथ लगाने को जी नहीं चाहता है।
याद दिलाते हो बचपन जिसे तुम चलाते थे, गिरने पर उठाते थे ।।

जो तुमने सौंपा ज़िद्द थी तुम्हारी, पागलपन था या ज़िम्मेवारी।
जो तुम्हे मिल रहा है, वो चढ़ती उम्र की खुमारी ।।

निपट जाओ तुम, वर्ना निपटा दिए जाओगे।
मचल रहे है हाथ अपनों के, सलटा दिए जाओगे ।।

निपट जाओ तुम, कि अब देखा नहीं जाता तुम्हारा दर्द और क्रंदन।
कर देंगे तुम्हारा वह सब, जिसे कहते है संस्कार, श्राद्ध और तर्पण ।।

सिर्फ़ एक बात बताते जाना, इससे पहले कि देर हो जाए।
अपने पिता को कहा फेंका था तुमने? क्यों ना तुम्हे भी वही पटका जाए ।।





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