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चलो आज थोड़ी सी रम पी लें


छत पे तो रोज़ चढ़ते हैं, आज बादलों के पार वाले ग़म पी ले! (चलो आज थोड़ी सी रम पी लें)
उस पार भी तो कोई रोता होगा, चलो एक छलांग भर के उसके ज़ख्म सी ले!! (चलो आज थोड़ी सी रम पी लें)

और जब मैं बहकने लगूँ, तो दोस्त होने के नाते ये फ़र्ज़ है तेरा! 
के तू मेरे हाथ न रोके और ये न कह की थोड़ी कम पी ले!! (चलो आज थोड़ी सी रम पी लें)

सुनते है ग़ालिब को भी पीने का शौक था, अच्छा शौक था!
सयाने होते है पीने वाले, आज इस बहाने, कल उस बहाने से पी लें!! (चलो आज थोड़ी सी रम पी लें)

रम के खुलते ही फैल जाती है खुशबू फिज़ाओ में, रुको यार ज़रा महसूस तो करने दो!
उफ़ अब ना रोक साकी, चाहे तो मेरी शर्म पी ले!! (चलो आज थोड़ी सी रम पी लें)

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हुनर

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