Skip to main content

चलो आज थोड़ी सी रम पी लें


छत पे तो रोज़ चढ़ते हैं, आज बादलों के पार वाले ग़म पी ले! (चलो आज थोड़ी सी रम पी लें)
उस पार भी तो कोई रोता होगा, चलो एक छलांग भर के उसके ज़ख्म सी ले!! (चलो आज थोड़ी सी रम पी लें)

और जब मैं बहकने लगूँ, तो दोस्त होने के नाते ये फ़र्ज़ है तेरा! 
के तू मेरे हाथ न रोके और ये न कह की थोड़ी कम पी ले!! (चलो आज थोड़ी सी रम पी लें)

सुनते है ग़ालिब को भी पीने का शौक था, अच्छा शौक था!
सयाने होते है पीने वाले, आज इस बहाने, कल उस बहाने से पी लें!! (चलो आज थोड़ी सी रम पी लें)

रम के खुलते ही फैल जाती है खुशबू फिज़ाओ में, रुको यार ज़रा महसूस तो करने दो!
उफ़ अब ना रोक साकी, चाहे तो मेरी शर्म पी ले!! (चलो आज थोड़ी सी रम पी लें)

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

हुनर

वह नगीनों की घिसाई का काम करता था। उसकी पारखी आँखें कम रोशनी में भी खोट पहचान लेती थी और उसी परख की बदौलत घर का चूल्हा रंग बदलता था। चुनिंदा रंग देखे थे उन आँखों ने पर नीलम का मोरिया रंग उसे बहुत भाता था। जिस दिन मालिक उसे नीलम पकड़ा देता, मानो उसे खुद की सुध-बुध न रहती। उसकी हालत दारु के ठेके के बाहर बैठे दारुड़ियों सी हो जाती। वह उसे उठा-उठा के देखता, अपनी आँखों के सामंने नचाता, उसे काटते हुए उसका कलेजा रह-रह कर मुँह को आता। बालों में सफेदी आयी और आँखों में धुंधलापन। अब सिवाय डबडबायें रंगों के और कुछ न दिखता। बैठक अब किसी सेठ की गद्दी पर न होकर घर के बाहर के नीम के नीचे पड़ी खाट पर होती। गली के बच्चे खेल-खेल में उसे कंचे और पत्थर थमा देते और उसके कानों में कटिंग मशीन की गरारियों का शोर गूँज उठता और हाथ ख़ुद ब ख़ुद पत्थर को आँखों के सामने हिलाने-ढुलाने लगते। पत्थरों का क्या है...किसी भी रंग के सही। 

नहीं

क्या खोज रहा हूं, किसकी प्यास है पता नहीं दरिया, समंदर, किश्ती, किनारा, इनकी मुझे तलाश नहीं। रो दूं, तो आंसू भी ज़मी पी जाए जो न रोऊं, तो ख़ून में आंच नहीं। पत्थर के घर में रहता हूं, शीशा बनकर टूट जाऊं तो किसी का मोहताज नहीं। रात है, बात है, रात की ही बात है सुबह बोल जाऊं तो मुझसा बदज़ात नहीं। क्या देखते हो, क्या देखने आए हो  तुम्हें पसंद आए, ऐसे तो हालात नहीं। रात को इंसा भौंकते हैं, और कुत्ते सोते हैं किसकी सरकार है, के आदमी की कोई औकात नहीं।

अब तलक वो - ग़ज़ल

अब तलक वो हमें याद करते हैं, थोड़ा-थोड़ा बर्बाद करते हैं।। काफ़िला तो गुज़र गया यारों, मुसाफ़िरों को याद करते हैं।। मंज़रे सहरा तब उभर आया, जब वो बारिश की बात करते हैं।। इंसा-इंसा को भी क्या देगा, क्यों हम उनसे फ़रियाद करते हैं।।  ज़िल्लतें जिनकी ख़ातिर पी हमने, वही हमसे किनारा करते हैं।। थका-हारा दिल आख़िर टूट गया, क्यों अब उससे कोई आस रखते हैं।।