Skip to main content

रोज़ समीकरण बदलते है

रोज़ समीकरण बदलते हैं, हम ठीक हैं सब इसी धोखे में चलते है!
दूसरे की काट के गर्दन, अपनी बचा के निकलते है!!

कहते हैं, मीडिया और पोलिटिक्स में ही गन्दा खेल चलता है!
अरे जाइये साहब!  दुश्मन हर पेशे में पलते हैं!!

कौन किसका अहसान मानता है आज, जो जिसे बनाता है लोग उसी का दामन  कुचलते हैं!

याद रखियेगा ये किताब कभी बाज़ार में नहीं आएगी, इसके किरदार आये दिन बदलते हैं!
रोज़ समीकरण बदलते हैं, हम ठीक कर रहे हैं सब इसी धोखे में चलते हैं!!



Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

नहीं

क्या खोज रहा हूं, किसकी प्यास है पता नहीं दरिया, समंदर, किश्ती, किनारा, इनकी मुझे तलाश नहीं। रो दूं, तो आंसू भी ज़मी पी जाए जो न रोऊं, तो ख़ून में आंच नहीं। पत्थर के घर में रहता हूं, शीशा बनकर टूट जाऊं तो किसी का मोहताज नहीं। रात है, बात है, रात की ही बात है सुबह बोल जाऊं तो मुझसा बदज़ात नहीं। क्या देखते हो, क्या देखने आए हो  तुम्हें पसंद आए, ऐसे तो हालात नहीं। रात को इंसा भौंकते हैं, और कुत्ते सोते हैं किसकी सरकार है, के आदमी की कोई औकात नहीं।

हुनर

वह नगीनों की घिसाई का काम करता था। उसकी पारखी आँखें कम रोशनी में भी खोट पहचान लेती थी और उसी परख की बदौलत घर का चूल्हा रंग बदलता था। चुनिंदा रंग देखे थे उन आँखों ने पर नीलम का मोरिया रंग उसे बहुत भाता था। जिस दिन मालिक उसे नीलम पकड़ा देता, मानो उसे खुद की सुध-बुध न रहती। उसकी हालत दारु के ठेके के बाहर बैठे दारुड़ियों सी हो जाती। वह उसे उठा-उठा के देखता, अपनी आँखों के सामंने नचाता, उसे काटते हुए उसका कलेजा रह-रह कर मुँह को आता। बालों में सफेदी आयी और आँखों में धुंधलापन। अब सिवाय डबडबायें रंगों के और कुछ न दिखता। बैठक अब किसी सेठ की गद्दी पर न होकर घर के बाहर के नीम के नीचे पड़ी खाट पर होती। गली के बच्चे खेल-खेल में उसे कंचे और पत्थर थमा देते और उसके कानों में कटिंग मशीन की गरारियों का शोर गूँज उठता और हाथ ख़ुद ब ख़ुद पत्थर को आँखों के सामने हिलाने-ढुलाने लगते। पत्थरों का क्या है...किसी भी रंग के सही। 

अब तलक वो - ग़ज़ल

अब तलक वो हमें याद करते हैं, थोड़ा-थोड़ा बर्बाद करते हैं।। काफ़िला तो गुज़र गया यारों, मुसाफ़िरों को याद करते हैं।। मंज़रे सहरा तब उभर आया, जब वो बारिश की बात करते हैं।। इंसा-इंसा को भी क्या देगा, क्यों हम उनसे फ़रियाद करते हैं।।  ज़िल्लतें जिनकी ख़ातिर पी हमने, वही हमसे किनारा करते हैं।। थका-हारा दिल आख़िर टूट गया, क्यों अब उससे कोई आस रखते हैं।।