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क्यों नहीं

आजकल वो हमसे उलझते नहीं, सवाल दिल के सुलझते नहीं। माना दुशवारियाँ है राहों में, पर पैर यूँ भी तो पटकते नहीं।। वक़्त है कम और बातें बहुत है, उनके जज़्बात अब भटकते नहीं। तू है अपना और अपना रहेगा, ये एहसास कहीं अटकते नहीं।। गहरा है पानी कुछ और आगे सनम, और क़दम आपके लरज़ते नहीं। हाथ जो हाथ में थाम लेते है, फिर यूँ भी तो पलटते नहीं।। चुन लिया है तुम्हें सबको अनसुना करके, बात-बात पर यूं बहकते नहीं। इश्क़ है ज़हर तो ज़हर ही सही, मान कर दवा गटकते नहीं।।

नहीं

क्या खोज रहा हूं, किसकी प्यास है पता नहीं दरिया, समंदर, किश्ती, किनारा, इनकी मुझे तलाश नहीं। रो दूं, तो आंसू भी ज़मी पी जाए जो न रोऊं, तो ख़ून में आंच नहीं। पत्थर के घर में रहता हूं, शीशा बनकर टूट जाऊं तो किसी का मोहताज नहीं। रात है, बात है, रात की ही बात है सुबह बोल जाऊं तो मुझसा बदज़ात नहीं। क्या देखते हो, क्या देखने आए हो  तुम्हें पसंद आए, ऐसे तो हालात नहीं। रात को इंसा भौंकते हैं, और कुत्ते सोते हैं किसकी सरकार है, के आदमी की कोई औकात नहीं।